~़ं.  लोग सीख़ा देते हैं  .़ं~

कारवां युंही आगे बढ़ता चला जाता है;
कुछ लोग बिछड़ जाते हैं राहों में,
तो कुछ जुड़ते चले जाते हैं.

जिंदगी के ईस सफ़र में भी कुछ एसा ही है;
कुछ लाेग मर-मीट कर दिवारों पर लगी तसबीरों में कैद हो जाते हैं,
तो कुछ अपनेपन की खूशबु लेकर सबके दिलों में बस जाते हैं.

कुछ लम्हे युहीं बीत जाते हैं;
तो कुछ लम्हे आखों से ब़रसती बुंदो में सीमट जाते हैं.

जिंदगी युहीं चलती रहती हैं;
तो कुछ पल थम से जाते हैं.

घड़ी की सुईयां तेज़ी से दौड़ती है और दिन युहीं गुज़र जाते हैं;
तो कुछ घड़ीयां एसी होती है जो रुक कर हमारे होने का एहसास दे जाती है.

जिंदगी में बहोत से लोग मीलते हैं;
तो कुछ बीना मीले सबक सिख़ा जाते हैं.

जिंदगी सभी बिताते हैं;
तो कुछ जी जाते हैं.

कामियाबी के रंगो की होली सबके नसीब के पन्नो में लीखी नही होती;
तो कुछ हाथों की लकिरों में ढुंढते, मीट जाते हैं.

खुन-पसिना कभी एक नही होता.
पसीना(काम) एग जगह और खुन(परिवार) दुसरी जगह रहने चाहिये;
तो कुछ एसे होते हैं जो खुन बहा कर देश का नाम रोशन करते हैं;
तो कुछ पसिना बहाकर देश को आगे बढ़ाते हैं;
तो कुछ खुन-पसिना एक करके देश को देश बनाते हैं.

कामियाबी किसीके कद़म चुमती है;
तो कुछ इज्ज़त और ईमान के बोज़ के नीचे कुचल जाते हैं.

गिरगीट की तरह रंग बदलते हैं लोग;
तो कुछ अपने इन रंगो से दुसरों के दिलों को रंगबीरंगी बना देते हैं.

सभी फ़ल मीठे नही होते;
तो कुछ मीठे फ़लों को बीना चख़े, मेहनत के गुणगान गाते हैं.

लोग तो बहुत हैं ईस खुबसूरत दुनिया में;
पर कुछ ज़ीदगी का मकसद सीख़ा जाते हैं;

तो कुछ रो कर हँसना सीख़ा देते हैं;

कुछ सिढ़ीयों से गीरकर फ़िर चढ़ना सीख़ा देते हैं;

तो कुछ चढ़कर ऊचांईयों पर टीकना सीख़ा देते हैं.

लोग तो बहुत आते हैं;
तो कुछ ज़ीदगी की किताब़ के पन्नो पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

कुछ लोग एसे होते हैं जो जिंदगी से ना डरे आगे बढ़ना सीख़ा देते हैं.

अस्थिर कद़मों से चलना सीख़ा देते हैं;

ताक़त वाले हाथों से, समाज से लड़ना सीख़ा देते हैं;

बीना पँखों के ऊड़ना सीख़ा देते हैं;

निर्मल विचारों और बडे़ सपनों में खो कर जीना सीख़ा देते हैं.

कारवां भले युहीं आगे बढ़ता रहे;
पर,
कुछ लोग हट़कर, कामियाब होना सीख़ा देते हैं;
तो
कुछ बस खुलके जीना सीख़ा देते हैं.
सीर्फ,
जिंदगी बीताना नही, जिंदगी खुशी से जीना सीख़ा देते हैं.
बस,
जिंदगी जीना सीख़ा देते हैं.

जीना सीख़ा देते हैं.

— दिगंत सुरती.

धन्यवाद.

This poem was my first Hindi poem and took more than 5 hours to complete and edit fully with some editions and later it was typed in Hindi font by Digant Surti.

Thanks for reading.

Digant Surti.

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